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Karma

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कर्म क्या है? उसे कैसे करना चाहिए?


जब तक आप कर्म बांधते हैं, तब तक आपके लिए हमेशा पुनर्जन्म है ही। अगर आप को कर्म बंधन होगा तो अगले जन्म में आपको उसके परिणाम भुगतने ही पड़ेगें। क्या इस सच्चाई से कि भगवान महावीर को अगला जन्म नहीं लेना पड़ा, यह सिद्ध नहीं होता कि रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी कर्म बंधन न हो?

कर्म के सम्बन्ध में भगवान कहते हैं- कर्म हर किसी को करना ही चाहिये। गीतोपदेश देते हुए उन्होंने कहा कि तुम अपना कर्तव्य करते चले जाओ, फल ईश्वर देगा। कर्तव्य और फल का अकाट्य सम्बन्ध है।अर्जुन यहाँ उनसे प्रश्न करता है कि "ज्ञान यदि श्रेष्ठ है तो फिर ये घोर कर्म आप मुझसे क्यों करा रहे हैं? युद्ध एक क्रूर और घोर कर्म है, इसमें मैं फंसना नहीं चाहता।" ज्ञान व कर्म का अटूट रिश्ता है। ज्ञान के बिना कर्म प्रतिफलित नहीं होता तथा कर्म के बिना ज्ञान केवल काग़ज़ पर लिखे ऐसा शब्द मात्र है, जिसका लाभ न व्यक्ति को मिलता है और न समाज को। अतः मनुष्य को ज्ञानी बनकर अपना कर्म आनन्द एवं निष्ठापूर्वक करना चाहिए।

पुण्य एवं पाप क्या हैं ?

  • पुण्य अच्छे कर्मों का फल है, जिनके कारण हम सुख अनुभव करते हैं । पुण्य वह विशेष ऊर्जा अथवा विकसित क्षमता है, जो भक्तिभाव से धार्मिक जीवनशैली का अनुसरण करने से प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ मित्रों की आर्थिक सहायता करना अथवा परामर्श देना पुण्य को आमन्त्रित करना है । धार्मिकता तथा धर्माचरण की विवेचना अनेक धर्मग्रंथों में विस्तृतरूप से की गई है । पुण्य के माध्यम से हम दूसरों का कल्याण करते हैं । उदाहरण के लिए कैन्सर पीडितों की सहायता के लिए दान करने से कैन्सर से जूझ रहे अनेक रोगियों को लाभ होगा, जिससे हमें पुण्य मिलेगा । पाप क्या है, पाप बुरे कर्म का फल है, जिससे हमें दुख मिलता है । किसी और का बुरा चाहने की इच्छा से कर्म करने पर पाप उत्पन्न होता है । यह उन कर्मों से उत्पन्न होता है जो प्रकृति अथवा ईश्वर के नियमों के विपरीत अथवा उसके विरुद्ध हों । उदाहरण के लिए यदि कोई व्यापारी अपने ग्राहकों को ठगता है, तो उसे पाप लगता है । कर्त्तव्य-पूर्ति नहीं करने पर भी पाप उत्पन्न होता है, उदा. जब कोई पिता अपने बच्चों की आवश्यकताओं की ओर ध्यान नहीं देता अथवा जब वैद्य अपने रोगियों का ध्यान नहीं रखता । पुण्य और पाप इसी जन्म में, मृत्यु के उपरांत अथवा आगामी जन्मों में भोगने पडते हैं । पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्य और पाप लेन-देन के हिसाब से सूक्ष्म होते हैं; क्योंकि लेन-देन का हिसाब समझना तुलनात्मक रूप से सरल है उदा. परिवार के स्तर पर, परन्तु यह समझना बहुत कठिन है कि क्यों किसीने एक अपरिचित का अनादर किया ।

    • कर्म, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, एक ऐसी व्यवस्था है जो कि आपके और मेरे ऊपर कार्यरत् है। कर्म का अर्थ बहुत सी बातें हो सकती हैं, परन्तु इसका मौलिक विचार हमारे द्वारा किए हुए कामों से है और धार्मिक कार्यों के लाभ और बुरे कार्यों के लिए दण्ड हमारे प्राणों के साथ जुड़ा हुआ है। जब तक हमारे कार्य पूरी तरह से धार्मिक नहीं होते तब तक हम पर इनका दण्ड है, और जब तक यह दण्ड नहीं दे दिया जाता हम बन्धन में पड़े हुए हैं। हम सभी किसी न किसी तरीके से सहज बुद्धि से इनका अहसास करते हैं। और हमारी बुद्धि और ज्ञान के द्वारा हमने बहुत से ऐसे तरीकों को इन जमा किए हुए कर्मों से निपटारा करने के लिए आविष्कृत कर लिया है। एक मार्ग कर्म मार्ग है (कामों का एक मार्ग) जिसमें हम भले कामों के लिए बहुत ही कठिन मेहनत करते हैं। मंत्र और पूजा हैं जिनका उच्चारण किया जाता है। त्योहार और पवित्र स्नान जैसी बातें हैं जिनमें भाग लिया जाता है। ये तरीके बहुत ही कठिन हैं और हमें कभी भी आश्वस्त नहीं किया गया है कि हमारे प्रयास पर्याप्त हैं। क्या हमारे कर्मों के पीछे की गई मंशा भली थी? क्या भले कर्मों की सँख्या की मात्रा पर्याप्त है? हम इसके लिए कभी भी सुनिश्चित नहीं हैं। और इसलिए, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, हम कर्मों में बने रहते हुए, स्वयं को मोक्ष प्राप्त करने और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सक्षम नहीं हैं। इसलिए ही पूजा करने से पहले अधिकांश लोग प्ररथास्नाना (या प्रतासना) मंत्र (“मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ। मैं पाप में उत्पन्न हुआ। मेरा प्राण पाप के अधीन है। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।”) का उच्चारण करते हैं।

  • मोक्ष – कर्मों से स्वतंत्रता को प्राप्त करना

    मेरा जन्म प्रकृति (nature) और आत्मा (soul) के मिलन से हुआ है. मेरे जीवन के दो घटक (component/factor) है आत्मा और प्रकृति, आत्मा में सतोगुण (truth quality) प्रधान है इसलिए दोनों आत्मा और प्रकृति का संयोग (connection) होता है तो जीव (creature) की उत्पत्ति (origin) होती है जब आत्मा के गुण सत् (truth) तथा प्रकृति के गुण तम (darkness) का संयोग होता है तब रजोगुण (sage quality) का प्रकटीकरण (formulation) होता है. सत् (truth) में क्रिया (deed) नहीं है तम (darkness) में क्रिया (deed) नहीं है दोनों शांत है. एक ज्ञान में शांत है एक अज्ञान में शांत है लेकिन रज (sage) में क्रिया है. आत्मा और प्रकृति से संयोग से जीव बना, उसके साथ ही साथ सत् और तम के रज से संयोग बना. रज में क्रिया है. जीव के जन्म से ही क्रिया का साथ मिलता है. अत: क्रिया जीव की सहज प्रकृति बन जाती है . जैसे हम देखते है एक छोटे बच्चे का सहज स्वभाव हाथ पैर चलाना है. यह सहज क्रिया (action) है. लेकिन यही सहज जब मेरी बुद्धि से जुड़ती है तो यह क्रिया निस्वार्थ (selfless) न होकर स्वार्थ मय (selfishness) हो जाती है तब इसे कर्म कहते है. जैसे बालक कोई वस्तु (object) देखता है तो उसे लेने का प्रयास (try) करता है. अब वह सहज क्रिया हाथ पैर चलाने की न रहकर, उस वास्तु को प्राप्त (get) करने की हो जाती है. जब तक सहज क्रिया तब तक कोई भी कर्म का संस्कार नहीं बनता. जहाँ से सहज क्रिया में क्रत्तापन (doingness) आया वहीँ वह कर्म हो गया. और वहां से ही कर्म का संस्कार बनना प्रारंभ (start) हो जाता है. ये संस्कार ही हमारे जीवन में दुख, सुख, शांति, अशांति तथा जन्म, मरण (death) के कारण है. भगवान कृष्ण भी गीता यही उपदेश करते है कि कर्म तो करो, लेकिन इस प्रकार से करो कि उसका संस्कार न बने. अर्थात सहज कर्म हो. प्रकृति के संयोग से उत्पन्न होने के कारण जीव में प्रक्रति का संग दोष (defect) लग गया है. अब उसके काल कर्म और बुद्धि का स्वरुप (form) बदल गया है. प्रकृति के संग दोष से पहले वह आत्म स्वरुप था न भूतकाल था न भविष्य काल था वहां केवल मात्र वर्तमान काल ही था. विशाल वर्तमान जहाँ कर्म के साथ संस्कार नहीं थे केवल मात्र सहज कर्म ही था. ज्ञान के स्थान पर विवेक था. प्रकृति में अल्पज्ञता (superficiality) है प्रमाद है. जीव के प्रवल शत्रु (enemy) अल्पज्ञता एवं आलस्य (laziness) ही है. अत: आवश्यक है हमारा यह प्रकृति का संग दोष छुट जाये. यदि प्रकृति का संग दोष छुट जाये तो हमारा कार्य क्षेत्र (working place) विशाल होगा. सारा वर्तमान हो होगा. कर्मों के संस्कार नहीं बनेगे अत: न दुःख होगा, न अशांति होगी, न जन्म होगा, न मृत्यु, न मोह रहेगा, न ममता, निर्णय करने की क्षमता बढ़ेगी.

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