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Pavitra Jal

अभिमंत्रित जल ( Holy Water ): विभूति द्वारा बनाया पवित्र जल (

पानी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है । पानी से ही जिन्दगी है । मनुष्य शरीर में 70 % या 90 %पानी है । कहते हैं की की हमारे विचारों शब्दों संगीत आदि का पानी पर गहरा प्रभाव पड़ता है ।positive विचारों के साथ तथा सोच से प्रभावित पनिपीने पर लोगों के स्वास्थ्य में वृद्धि हुई है । अनेक प्रशिक्षण द्वारा इस बात को सर्व सिद्ध कियागया है की पानी की गुणात्मकता प्रभावित होजाती है यदि मन की सोच अच्छी हो ।सकारात्मक सोच रखने से तन मन बुद्धि पर स्वस्थ प्रभाव पड़ता है । अपने शरीर के पानी को भी अच्छे विचारों द्वारा स्वच्छ बना कर् खुद को शारीरिक मानसिक तथा भावनात्मक तौर पर मजबूत बना सकते हैं । एक समूह द्वारा पानी कोप्यार भरे धन्यबाद के वायाब्रेशन्स दिए गए ।एक अन्य पानी को कुछ बर्तनों में रखा गया जिनपर शान्ति प्यार आभार आशा आदि लिखा हुआ था । इन सभी पानी के नमूनों को जमा कर microscope से देखा गया तो सभी samples केसुन्दर cristle विकसित हो गए । गायत्री मन्त्र से अभिमंत्रित जल रोगी को स्वस्थ बना देता है यह जल जीवन प्रदाता हो जाता है ।इस प्रकार अच्छे विचारों शब्दों व् सोच द्वारा पानी के ढाँचे में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उसकी जिन्दगी देने के गुण में बढ़ोतरी की जा सकती है । संत लोग कहते हैं कि भोजन व् पानी का सेवन तनाव मुक्त एवं शान्त मन से ही करना चाहिए वर्ना इसका सेहत पर बुरा असर पड़ता है । पानी को रोगहर भी कहा जाता है । सूना है न कि "गंगा तेरा पानी अमृत " पानी जीवन दायिनी शक्ति है । इंसान एक बार विना भोजन के तो आठ दस दिन रह सकता है पर बिना पानी के तीन दिन भी नहीं रह सकता । इसीलिए पानी को अभिमंत्रित करके पिलाना किसी भी प्राणी को जीवन दान देने जैसा है । दर्जिलिग़ की घटना है कि एक व्यक्ति को भयंकर कैंसर हो गया । डॉक्टर्स ने उसका जीवन केवल तीन महीना बतलाया । वहाँ ब्रह्मकुमारी बहिनों ने पानी चार्ज करके पिलाया ।क्या किया एक जग पानी शिव बाबा के कमरे में रख देतीं थीं । ब्रह्म मुहूर्त में साधक meditation करते थे । सभी संकल्प करते थे कि "मैं पवित्र आत्मा हूँ.." । फिर वह पानी मरीज को पिलाया जाता था । तीन मास में ही वह व्यक्ति ठीक हो गया । यह है पानी की शुद्धता का प्रत्यक्ष उदाहरण । तो पाठको पानी को हाथ में लेकर कहो कि " मैं पबित्र आत्मा हूँ " ऐसा 21बार कहो तत्पश्चात पानी का सेवन करो ॐ तत् सत हरि ओम तत्सत सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया ।सर्वे भद्राणि पश्यन्ति मा कश्चिद् दुःख भाग भावेतु ।

पवित्र जल (पवित्र जल) बनाने की अनेक पद्धतियां हैं । ये इस प्रकार हैं :

  • १. पवित्र रक्षा (विभूति) जल में डालकर
  • २. जल को नामजप से अभिमंत्रित कर
  • ३. पवित्र मिट्टी जल में डालकर (जहां उच्च आध्यात्मिक स्तर के संतो का वास्तव्य हुआ है, ऐसे स्थानों की मिट्टी)
  • ४. आशीर्वाद देनेवाला जल । (यह केवल ५० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के अधिक स्तर का व्यक्ति ही बना सकता है । इस स्तर के नीचे के व्यक्ति में जल में ईश्वरीय चैतन्य बढाने की क्षमता अत्यल्प होती है अथवा नहीं होती ।)
  • ५. स्पर्शद्वारा बनाया पवित्र जल (पवित्र जल) : (जब कोई संत जल को स्पर्श करते हैं)
  • पवित्र जल से होनेवाले लाभ में वृद्धि कैसे कर सकते है

  • पवित्र रक्षा (विभूति) की आध्यात्मिक शुद्धता : अयोग्य पद्धति से प्रयोग करने, संग्रहित करने अथवा मृत पूर्वजोंद्वारा अथवा अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण से यदि पवित्र जल बनाने के लिए प्रयुक्त पवित्र रक्षा रज-तम के संपर्क में आती है, तो इससे मिलनेवाले लाभ न्यून हो जाते हैं । पवित्र विभूति का उपयोग कैसे करें, इस लेख का संदर्भ लें ।
  • प्रयोग करनेवालेकी श्रद्धा : श्रद्धा के साथ उपयोग करने से पवित्र जल के आध्यात्मिक उपचार के रूप में अच्छे परिणाम मिलते हैं ।
  • प्रयोग करनेवाले व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर : पवित्र जल का आत्मनिर्भर होने हेतु किए जानेवाले आध्यात्मिक उपचार के रूप में प्रयोग करनेवाले व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर अधिक होने पर उसकी कार्यक्षमता भी अधिक होती है ।
  • उपचार करनेवाले व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर (यदि यह व्यक्ति इसका प्रयोग आध्यात्मिक उपचार के रूप में कर रहा हो) : आध्यात्मिक उपचार के रूप में पवित्र जल के उपयोग का परिणाम ९५ प्रतिशत तक उसे छिडकनेवाले व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर होता है ।


    • (पवित्र जल) का उपयोग किस प्रकार करें ?

      पवित्र जल में चैतन्य से प्राप्त हुई सकारात्मक ऊर्जा होती है, अतः इसका उपयोग सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने में हो सकता है, जो अनिष्ट शक्तियों (भूत, प्रेत, पिशाच आदि) से रक्षण भी करती है तथा उन्हें दूर करने में सक्षम भी होती है ।
      शरीर के जिन अंगों में दर्द हो, उस पर इस पवित्र जल को छिडकने से कष्ट की मात्रा अत्यधिक घट जाती है । ऐसा विशेषकर तब देखा गया है जब कष्ट आध्यात्मिक कारणों से अर्थात् भूत-प्रेतादि के आक्रमण के कारण हो रहा हो । कष्ट का मूल कारण आध्यात्मिक है अथवा नहीं, इसका ज्ञान मात्र विकसित छठवीं ज्ञानेंद्रिय द्वारा ही हो सकता है । बौद्धिक स्तर पर केवल इतना कह सकते हैं कि सर्वसामान्य जांच पडताल के उपरांत भी जब रोग का निश्चित निदान न हो पाए, हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि कष्ट आध्यात्मिक कारणों से हो रहा है । पवित्र जल में विद्यमान चैतन्य कष्ट से पीडित अंगों के सूक्ष्मतम दुर्गुण और साथ ही उस अंग में पीडा पहुंचानेवाले अनिष्ट शक्ति को भी नष्ट करता है । नेत्रों में पवित्र जल लगाने से अप्राकृतिक झपकी अथवा तंद्रा (drowsiness) दूर होती है ।

    • व्यक्ति पर, उसके चारों ओर, उसके बिछौने पर पवित्र जल छिडकना ।

      एक गिलास अथवा एक कटोरी में जल लें । जल को अभिमंत्रित कर अथवा Moksha द्वारा बनाई हुई अगरबत्तियों से प्राप्त विभूति जल में डालकर, उस जल को अच्छी शक्ति से आविष्ट कर सकते हैं । इस पवित्र जल को छिडकने से पूर्व प्रार्थना करें कि इस पवित्र जल से अच्छी शक्ति प्रसारित हो तथा उससे अनिष्ट शक्तियों का नाश हो जाए । तदुपरांत पवित्र जल का छिडकाव स्वयं पर तथा उस व्यक्ति पर करें, जो कष्टों से पीडित हो ।
      बिछौने पर सोने से पूर्व पवित्र जल का छिडकाव करें, जिससे प्रसारित होनेवाली अच्छी शक्ति का लाभ हो, साथ ही भूतप्रेतादि बुरी शक्ति से रक्षण हो । यह एक अच्छा उपाय है, जिससे जैसे नींद में बुरे सपने आना, निरंतर सपनों का आना तथा नींद ही न (अनिद्रा) आना, कष्टों का निवारण होता है । यह कष्ट मुख्यत: भूतप्रेतों एवं अतृप्त पूर्वजों के कारण होते हैं । इसी प्रकार, पवित्र जल का छिडकाव स्वयं पर, स्वयं के चारों ओर करें, उसी से एक सुरक्षा-घेरा बनाएं जो पढाई अथवा काम-काज करते समय अनिष्ट शक्तियों से हमारा रक्षण करे । पवित्र जल अपने घर के आस-पास छिडकने से आध्यात्मिक स्वच्छता होकर वहां पवित्रता बनी रहती है ।

    • भूतों पर पवित्र जल छिडकने का परिणाम

      निरंतर पवित्र जल छिडकने से अनिष्ट शक्तियों को बहुत कष्ट होता है; जिससे वह उस व्यक्ति को छोड जाने हेतु बाध्य हो जाते हैं एवं अंतिमतः उससे छोड जाती हैं । यहां एक वीडियो क्लिप दिया है, जिसमें अगरबत्तियों की विभूति से बने पवित्र जल का परिणाम अनिष्ट शक्तियों पर क्या होता है, यह दर्शाया गया है । यहां अनिष्ट शक्तियां प्रकट हो गई हैं; किंतु वे प्रकट न भी हों, जब उन पर पवित्र जल छिडका जाता है तो उन्हें अत्यधिक कष्ट होते हैं । आध्यात्मिक उपचार करने वाले साधक जो आध्यात्मिक उपचार हेतु पवित्र जल छिडक रहे हैं, का आध्यात्मिक स्तर ६० प्रतिशत से अधिक है । इससे पवित्र जल की परिणामकारकता में वृद्धि होती है ।

    • पवित्र जल का सेवन करना

      अभिमंत्रित जल के सेवन से शरीर में सूक्ष्म सत्व गुण बढता है जिससे सकारात्मकता में वृद्धि होती है । इससे शरीर में किसी भी प्रकार की न्यूनता हो, जैसे थकान, विभिन्न रोग, निद्रा-नाश, उदासी, अवसाद और जीवन की आर्थिक तथा सामाजिक समस्याएं आदि कष्टों का निवारण होता है । पवित्र जल का एक चम्मच नित्य सेवन करना, एक आध्यात्मिक पेय है जो सकारात्मक शक्ति स्तर को बढाता है । इसके फलस्वरूप भूत-प्रेतादि की बुरी शक्तियों के आक्रमणों से रक्षा होती है ।

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