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Soul : Way to Moksha

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मृत्यु के पीछे का विज्ञान : आत्मा और पुनर्जन्म


मृत्यु क्या है? मृत्यु के समय क्या होता है? मृत्यु के पश्चात क्या होता है? मृत्यु के अनुभव के बारे में कोई किस प्रकार बता सकता है? मृत व्यक्ति अपना अनुभव नहीं बता सकता, जिनका जन्म हुआ है उन्हें अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ याद नहीं, कोई नहीं जानता कि जन्म से पहले और मृत्यु के बाद में क्या होता है। परम पूज्य भगवान ने अपने ज्ञान द्वारा मृत्यु के रहस्य ज्यों के त्यों अनावृत किए है। क्या पुनर्जन्म एक सच्चाई है? ड़ारविन के उत्पत्ति के नियम के अनुसार जीवन एक कोशीय जीव से शुरू होकर मनुष्य में पहुँचने तक विकसित होता है। इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि उसके बाद में क्या होता है। दादाश्री वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जन्म के बारे में समझाते हैं। आत्मा के अस्तित्व में विश्वास के बिना पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है? जब आत्मा का स्वरूप समझ में आ जाएगा तो सभी पहेलियाँ सुलझ जाएँगी। पहले आत्मज्ञान प्राप्त कर लें और उसके बाद सभी पहेलियाँ सुलझ जाएँगी। आत्मा कभी भी मरता नहीं है, लेकिन जब तक आप आत्मभाव में नहीं आ जाते, आपको मृत्यु का डर बना रहेगा। जब मृत्यु के बारे में सभी तथ्य पता चल जाएँगे, तो मृत्यु का डर गायब हो जाएगा। मृत्यु के रहस्य जानने के लिए पढ़ें.....

हम हमारे कर्म के अनुसार लोगों से मिलते और बिछड़ते है|जब हम शोक करते है तब हमारे सपंदन मृत व्यक्ति के आत्मा तक पहुचकर उन्हें कष्ट देते है| इसलिए हमें उनके आत्मा की प्रगति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए|

  1. मृत्यु का भय तो अहंकार को रहता है, आत्मा को कुछ नहीं। अहंकार को भय रहता है कि मैं मर जाऊँगा, मैं मर जाऊँगा।
  2. यह देह है, वह आत्मा की अज्ञान दशा का परिणाम है।
  3. जन्म-मरण अर्थात् उसके कर्म का हिसाब पूरा हो गया, एक अवतार का जो हिसाब बांधा था, वह पूरा हो गया, इसलिए मरण हो जाता है।
  4. ज्ञानी पुरुष जब कॉज़ेज़ बंद कर देते हैं, तब सिर्फ इफेक्ट ही भुगतने का रहा। इसलिए कर्म बंधने बंद हो गए।
  5. मनुष्यदेह जो सार्थक करना आया तो मोक्ष की प्राप्ति हो सके।
  6. यह एक्सपायर होना, उसका मतलब क्या है, समझता है? बहीखाते का हिसाब पूरा होना, वह। इसलिए हमें क्या करना है? हमें बहुत याद आए वह, तो वीतराग भगवान से कहना कि उसे शांति दीजिए।
  7. अर्थात् 'कॉज़ेज़ इस भव में होते हैं। उसका 'इफेक्ट' अगले जन्म में भोगना पड़ता है!
  8. जो अहंकार है न, उसे आवागमन है। आत्मा तो मूल दशा में ही है। अहंकार फिर बंद हो जाता है, इसलिए उसके फेरे बंद हो जाते है!
  9. यहाँ तो कानून यह है कि जिसने बिना ह़क का लिया, उसके दो पैर के चार पैर हो जाएँगे।
  10. ऐसा है न, भगवान की दृष्टि से इस संसार में क्या चल रहा है? तब कहे, उनकी दृष्टि से तो कोई मरता ही नहीं। भगवान की जो दृष्टि है, वह दृष्टि यदि आपको प्राप्त हो, एक दिन के लिए दें वे आपको, तो यहाँ चाहे जितने लोग मर जाएँ, फिर भी आपको असर नहीं होगा, क्योंकि भगवान की दृष्टि में कोई मरता ही नहीं है।

जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

  • "जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति क्या है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ? मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न। शास्त्रों में 'आत्मा' 'की बात कही गई है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता है , "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?" शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का, न शरीर का कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं। आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। "

    • पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy) का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता है।पैर में चींटी काटता है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है। अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा अन्य महत्वपूर्ण अंगो में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है। रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत् भी आत्मा

  • जीवात्मा का अनेक बार मोक्ष प्राप्त करना

    ईश्वर, जीव तथा प्रकृति अनादि, नित्य, अविनाशी, अजर व अमर हैं। जीवात्मा ईश्वर से कर्मानुसार जन्म मरण प्राप्त कर कर्म-फलों को भोगता है। मनुष्य योनि उभय योनि है जिसमें मनुष्य पूर्व किये हुए कर्मों के फलों को भोगता भी है और नये कर्मों को करता भी है। मनुष्य जीवन में यदि मनुष्य वेदानुसार जीवन व्यतीत करते हुए समाधि अवस्था को प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है तो इससे वह मोक्ष का पात्र बन जाता है। ईश्वर साक्षात्कार के बाद वह अनेक बार समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार करता रहता है। प्रथम ईश्वर साक्षात्कार से आरम्भ होकर मृत्यु पर्यन्त वह जीवन मुक्त अवस्था में रहता है। मृत्यु होने पर उस जीवात्मा का मोक्ष होता है। यह मुक्ति अनेक जन्मों में किये हुए शुभ कर्मों का परिणाम होती है। मोक्ष में जाने के बाद अवधि पूरी होने पर उस जीवात्मा का मनुष्य योनि में पुनर्जन्म होता है।
    वह फिर नये सिरे से कर्म करना आरम्भ करता है और सम्भव है कि उसे पुनः मोक्ष मिल जाये व अनेक जन्म लेने के बाद उसका पुनः मोक्ष हो सकता है। ऐसा वैदिक साहित्य को पढ़ने से विदित होता है। संसार में जितनी भी प्राणी योनियां हैं उनमें सभी प्राणियों मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट व पतंग आदि में एक ही समान प्रकार का जीवात्मा है जो कर्मानुसार कभी मनुष्य तो कभी अन्य योनियों में जन्म लेते हैं। यह कर्म अनादि काल से चलता आ रहा है। हम सब भी अनादि काल से कर्मानुसार अनेक वा सभी योनियों में जन्म लेते आ रहे हैं। अनुमान से कह सकते हैं कि प्रायः हमारे सभी योनियों में अनेक अनेक बार जन्म हुए हैं। अनेक बार हम सांप, बिच्छू, सिंह व विषैले जीव वा प्राणी भी बने हैं। अनेक बार हमारा व सबका मोक्ष भी हुआ है। अतिश्योक्ति न होगी यदि यह भी कहें कि अनन्त अनन्त बार हमारे सभी प्राणी-योनियों में जन्म हुए हैं और अनन्त बार हमारा मोक्ष भी हुआ है। हम सभी मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिये और मोक्ष प्राप्ति के लिए किये जाने वाले कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये। मुमुक्षुओं के लिए किये जाने वाले कर्मों का उल्लेख सत्यार्थप्रकाश व दर्शन आदि ग्रन्थों में मिलता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन कर ज्ञान लाभ करना चाहिये जिससे हमारी आत्मा की उन्नति हो। मोक्ष संसार में सब सुखों से बढ़कर है। ऐसा शास्त्र व हमारे ऋषि मुनि कहते आये हैं और इसकी प्राप्ति के लिए भीषण तप व पुरुषार्थ भी करते आये हैं। हम अपने इस मनुष्य जीवन में भी तो सुख की इच्छा करके साध्य सुखों के अनुरूप साधनों का प्रयोग कर उन सुखों को प्राप्त करते ही हैं। मनुष्य जीवन में हम जिन सुखों को सुख मान कर उनको प्राप्त करने के लिए सारा जीवन लगा देते हैं, उनमें से कुछ लोगों को कुछ सुख ही प्राप्त होते हैं और कईयों को अनेक सुख जिनकी उन्होंने इच्छा की हुई होती है, प्राप्त नहीं होते। कई लोग तो सुखों की प्राप्ति के लिए रात्रि दिन धनोपार्जन में ही अपना सारा समय गवां बैठते हैं। अपने इस जीवन की उन्नति व परलोक के सुधार पर उनका ध्यान जाता ही नहीं है। ऐसे सांसारिक लोग धनोपार्जन आदि में अत्यधिक पुरुषार्थ करते हुए कम आयु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। हमारे कुछ मित्रों के साथ भी ऐसी घटनायें हुई हैं। उनका उपार्जित किया हुआ धन उनके परिवारजनों के काम तो आता है परन्तु जिसने अच्छे व बुरे कार्यों से धन उपार्जित किया, वह व्यक्ति उस धन से प्राप्त हो सकने वाले सुखों से वंचित ही रहे और संसार से चले गये। पता नहीं की उनका परलोक बना या बिगड़ा? यह जीवन तो उस धन से सुख भोगने से पहले ही समाप्त हो गया। बुद्धिमान मनुष्य वही है जो अपने से अधिक बुद्धिमान व विवेकशील मनुष्यों की बातों को माने व उनका आचरण करे। सृष्टि के आरम्भ से आज तक ऋषियों व वेद के विद्वानों से अधिक बुद्धिमान व विवेकशील मनुष्य उत्पन्न नहीं हुए हैं। वह सब मनुष्यों को मुमुक्ष बनने की प्रेरणा करते रहे हैं। स्वयं के जीवन से भी वह इसका उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं।

  • मरने के बाद आत्मा कहाँ जाती है?

    दुनिया के हर इंसान के मन में कभी न कभी यह प्रश्र अवश्य उठता है कि आखिर जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है? जब भी मन में मृत्यु का ख्यालआता है या किसी शवयात्रा को गुजरते हुए देखते हैं तो रोमांचित हो जाते हैं।आखिर यह मृत्यु है क्या? क्या होता है मरने के बाद? मृत्यु के विषय में दुनियाभर में अलग-अलग तरह की बातें और मान्यताएं प्रचलित हैं। इस तरह कि मान्यताओं और धारणाओं में से अधिकांश काल्पनिक,मनघढ़ंत एवं झूंटी होती हैं। किन्तु समय-समय पर इस दुनिया में कुछ ऐसे रत्नों,तत्वज्ञानियों एवं योगियों ने जन्म लिया है जिन्होंने अपने जीवन काल में ही इस महत्वपूर्णगुत्थी को सुलझाया है। ऐसे आत्मज्ञानी महापुरुष समाधि के उच्च स्तर पर पहुंचकर समय के बंधन से मुक्त हो जाते हैं यानि कि कालातीत हो जाते हैं।इस कालातीत अवस्था में पहुंचकर वे यह आसानी से जान जाते हैं कि मृत्यु से पहले जीवन क्या था? और मृत्यु के बाद जीवन की गति क्या होती है। ऐसे ही पहुंचे हुए सिद्ध योगियों का स्पष्ट कहना है कि काल की तरह जीवन भी असीम ओर अनंत है। जीवन का न तो कभी प्रांरभ होता है और न ही कभी अंत। लोग जिसे मृत्यु कहते हैं वह मात्र उस शरीर का अंत है जो प्रकृति के पांच तत्वों (पृथ्वी,जल,वायु,अग्री और आकाश) से मिलकर बना था। आखिर मृत्यु के बाद आत्मा जाती कहां है? ऐसा माना जाता है कि मानव शरीर नश्वर है,जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन अपने प्राण त्यागने ही पड़ते हैं. भले ही मनुष्य या कोई अन्य जीवित प्राणी सौ वर्ष या उससे भी अधिक क्यों ना जी ले लेकिन अंत में उसे अपना शरीर छोड़कर वापस परमात्मा की शरण में जाना ही होता है. यद्यपि इस सच से हम सभी भली-भांति परिचित हैं लेकिन मृत्यु के पश्चात जब शव को अंतिम विदाई दे दी जाती है तो ऐसे में आत्मा का क्या होता है यह बात अभी तक कोई नहीं समझ पाया है. एक बार अपने शरीर को त्यागने के बाद वापस उस शरीर में प्रदार्पित होना असंभव है इसीलिए मौत के बाद की दुनियां कैसी है यह अभी तक एक रहस्य ही बना हुआ है. किस्से-कहानियों या फिर अफवाहों में तो मौत के पश्चात आत्मा को मिलने वाली यात्नाएं या फिर विशेष सुविधाओं के बारे में तो कई बार सुना जा चुका है लेकिन पुख्ता तौर पर अभी तक कोई यह नहीं जान पाया है कि क्या वास्तव में इस दुनियां के बाद भी एक ऐसी दुनियां है जहां आत्मा को संरक्षित कर रखा जाता है अगर नहीं तो जीवन का अंत हो जाने पर आत्मा कहां चली जाती है? गीता के उपदेशों में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि आत्मा अमर है उसका अंत नहीं होता, वह सिर्फ शरीर रूपी वस्त्र बदलती है. वैसे तो कई बार आत्मा की अमर यात्रा के विषय में सुना जा चुका है लेकिन फिर यह सबसे अधिक रोमांच और जिज्ञासा से जुड़ा मसला है. शरीर त्यागने के बाद कहां जाती है आत्मा ? गरूड़ पुराण जो मरने के पश्चात आत्मा के साथ होने वाले व्यवहार की व्याख्या करता है उसके अनुसार जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो उसे दो यमदूत लेने आते हैं. मानव अपने जीवन में जो कर्म करता है यमदूत उसे उसके अनुसार अपने साथ ले जाते हैं. अगर मरने वाला सज्जन है, पुण्यात्मा है तो उसके प्राण निकलने में कोई पीड़ा नहीं होती है लेकिन अगर वो दुराचारी या पापी हो तो उसे पीड़ा सहनी पड़ती है. गरूड़ पुराण में यह उल्लेख भी मिलता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को यमदूत केवल 24 घंटों के लिए ही ले जाते हैं और इन 24 घंटों के दौरान आत्मा को दिखाया जाता है कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किए हैं. इसके बाद आत्मा को फिर उसी घर में छोड़ दिया जाता है जहां उसने शरीर का त्याग किया था. इसके बाद 13 दिन के उत्तर कार्यों तक वह वहीं रहता है. 13 दिन बाद वह फिर यमलोक की यात्रा करता है. पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं. उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है. ये तीन मार्ग हैं — १-अर्चि मार्ग. २- धूम मार्ग ३- उत्पत्ति-विनाश मार्ग. अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्गपितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है. मृत्यु कैसी भी हो काल या अकाल, उसकी प्रक्रिया छह माह पूर्व ही शुरू हो जाती है। छह माह पहले ही मृत्यु को टाला जा सकता है,अंतिम तीन दिन पूर्व सिर्फ देवता या मनुष्य के पुण्य ही मृत्यु को टाल सकते हैं। यह याद रखना चाहिए कि मौत का अहसास व्यक्ति को छह माह पूर्व ही हो जाता है। विकसित होने में 9 माह, लेकिन मिटने में 6 माह। 3 माह कम। भारतीय योग तो हजारों साल से कहता आया है कि मनुष्य के स्थूल शरीर में कोई भी बीमारी आने से पहले आपके सूक्ष्म शरीर में छ: माह पहले आ जाती है यानी छ: माह पहले अगर सूक्ष्म शरीर पर ही उसका इलाज कर दिया जाए तो बहुत-सी बीमारियों पर विजय पाई जा सकती है। -ओशो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार जन्म-मृत्यु एक ऐसा चक्र है, जो अनवरत चलता रहता है। कहते हैं जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना भी एक अटल सच्चाई है, लेकिन कई ऋषि- मुनियों ने इस सच्चाई को झूठला दिया है। वे मरना सीखकर हमेशा जिंदा रहने का राज जान गए और वे सैकड़ों वर्ष और कुछ तो हजारों वर्ष जीकर चले गए और कुछ तो आज तक जिंदा हैं। कहते हैं कि ऋषि वशिष्ठ सशरीर अंतरिक्ष में चले गए थे और उसके बाद आज तक नहीं लौटे। परशुराम, हनुमानजी, कृपाचार्य और अश्वत्थामा के आज भी जीवित होने की बात कही जाती है। जरा-मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। सोम या सुरा एक ऐसा रस था जिसके माध्यम से हर तरह की मृत्यु से बचा जा सकता था। इस पर अभी शोध होना बाकी है कि कौन से भोजन से किस तरह का भविष्य निकलता है। भविष्य में यह संभव होगा कि कैसे कौन-सा रस पीने से कार दुर्घटना से बचा जा सकता है। धन्वंतरि आदि आयुर्वेदाचार्यों ने अपने ग्रंथों में 100 प्रकार की मृत्यु का वर्णन किया है जिसमें 18 प्रमुख प्रकार हैं। उक्त सभी में एक ही काल मृत्यु है और शेष अकाल मृत्यु मानी गई है। काल मृत्यु का अर्थ कि जब शरीर अपनी आयु पूर्ण कर लेता है और अकाल मृत्यु का अर्थ कि किसी बीमारी,दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मर जाना। अकाल मृत्यु को रोकने के प्रयास ही आयुर्वेद निदान और चिकित्सा हैं। आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है। आयुर्वेदानुसार इसके भी 3 भेद हैं- 1. आदिदैविक. 2.आदिभौतिक. 3. आध्यात्मिक। आदिदैविक और आदिभौतिक मृत्यु योगों को तंत्र और ज्योतिष उपयोग द्वारा टाला जा सकता है,परंतु आध्यात्मिक मृत्यु के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अत: मृत्यु के लक्षण चिन्हों के प्रकट होने पर ज्योतिषीय आकलन के पश्चात उचित निदान करना चाहिए। जब व्यक्ति की समयपूर्व मौत होने वाली होती है तो उसके क्या लक्षण हो सकते हैं। लक्षण जानकर मौत से बचने के उपाय खोजे जा सकते हैं। आयुर्वेद के अनुसार बहुत गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज बहुत ही छोटा, सरल और सुलभ होता है बशर्ते कि उसकी हमें जानकारी हो और समयपूर्व हम सतर्क हो जाएं। मृत्यु के बारे में वेद, योग, पुराण और आयुर्वेद में विस्तार से लिखा हुआ है। पुराणों में गरूड़ पुराण,शिव पुराण और ब्रह्म पुराण में मृत्यु के स्वभाव का उल्लेख मिलेगा। मृत्यु के बाद के जीवन का उल्लेख मिलेगा। परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु के बाद घर में गीता और गरूड़ पुराण सुनने की प्रथा है, इससे मृतक आत्मा को शांति और सही ज्ञान मिलता है जिससे उसके आगे की गति में कोई रुकावट नहीं आती है। स्थूल शरीर को छोड़ने के बाद सच्चा ज्ञान ही लंबे सफर का रास्ता दिखाता है। ध्यान रहे कि मृत्यु के पूर्वाभास से जुड़े लक्षणों को किसी भी लैब टेस्ट या क्लिनिकल परीक्षण से सिद्ध नहीं किया जा सकता बल्कि ये लक्षण केवल उस व्यक्ति को महसूस होते हैं जिसकी मृत्यु होने वाली होती है। मृत्यु के पूर्वाभास से जुड़े निम्नलिखित संकेत व्यक्ति को अपना अंत समय नजदीक होने का आभास करवाते हैं।

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